vedic kal
वैदिक काल
परिचय - इस समय वैदिक सभ्यता का उदय हुआ जिसके निर्माता आर्य थे जिनका शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ गुणो वाला या उत्तम व्यक्ति होता था। वैदिक काल मे वैदिक साहित्य की रचना कि गइ्र्र जिसकी भाषा संस्कृत थी जिसे देववाणी कहा जाता था। कालान्तार मे पश्चिमी विद्वानो ने आर्यो को बाह्य आक्रमण कारी बताकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। आर्य यहि के निवासी है तथा ये यहि से इरान और यूरोप कि तरफ गए तथा सिंधु सभ्यता व वैदिक सभ्यता मे कई बाते एकसमान थी। दोनो प्रदेश सैन्धव प्रदेश ही थे।
1. भाषा एंव साहित्यिक समृध्दता- संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का गौरव है तथा सभी वेद और महाकाव्यो कि रचना संस्कृत भाषा मे कि गई। अधिकंाश भाषाओ कि जननी संस्कृत व्याकरण है। इसकी लिपी का विकास ब्राह्यी लिपी मे हुआ। जिसे मेकडाॅनल्ड ने अपनी पुस्तक संस्कृत साहित्य का इतिहास मे बताया है।
वैदिक साहित्य मे समस्त ज्ञानो का उल्लेख किया गया है तथा वेदो को अपौरूषेय माना गया है। ऋषियो ने जिस ज्ञान का साक्षात्कार किया है उन्हे मे लिखा गया है। मौखिक रूप से सुनाने के कारण इन्हे श्रुति कहा जाता है तथा प्रत्येक वेद संहिता मे ब्राह्यण, अरण्यक व उपनिषद होते है।
2.पुराण- पुराणो मे वंशावलियाँ मिलती है तथा इन्हे सर्वाधिक प्राचीन माना गया है। इनकी रचना दुसरी, तिसरी शताब्दी मे कि गई। कुल 18 पुराण तथा 29 उप पुराण है। ऋषियो ने इनका विशेष महत्व बताया है तथा सुत्र साहित्य मे कला सुत्र प्रमुख है जिसमे श्रौत सुत्र, गृह्य सुत्र, धर्म सुत्र प्रमुख माने गए है।
3. राजनैतिक व्यवस्था- इस समय कि सबसे छोटी राजनैतिक इकाई कुल थी तथा बडी इकाई राष्ट्र मे कई जन थे। कुल का मुखिया कुलुप, गाँव का मुखिया ग्रामणी, विश का अधिकारी विशपति, जन का मुखिया गोप तथा राष्ट्र का मुखिया राजा होता था। जनता राजा को कर देती थी। ऋगवेद मे 5 जनो के बारे मे उल्लेख मिला है जो निम्न है-
- अणु
- यदु
- तुर्वस
- पुरू
- दुह्य
इस समय दस राज्ञ युध्द के बारे मे भी उल्लेख मिला है। जिसमे राजा सुदास व्दारा विश्वामित्र को पुरोहित पद से हटाकर वशिष्ठ को नियुक्त किया जिससे विश्वामित्र नाराज होकर दस जन पदो के राजाओ कि सहायता से सुदास पर आक्रमण किया जिसमे सुदास विजय रहा। राजा कि सहायता के लिए पुरोहित व सेनापति कि महत्वपुर्ण भूमिका होती थी।
4. सभा व समिति- राजा कि निरकुंशता पर अंकुश लगाने के लिए दो सभाए प्रमुख थी। जिसमे समिति आम जनता के प्रतिनिधि कि होती थी तथा सभा छोटी संस्था होती थी जिसमे विशिष्ट व्यक्ति भाग लेते थे जो राजा को परामर्श एंव न्याय कार्य मे सहयोग करती थी।
5. महाकाव्य काल- रामयण व महाभारत प्रमुख महाकाव्य है। इस काल मे राजनैतिक व्यवस्था काफी संगठित हो चुकी थी। राजपद वंशानुगत था। जिससे देविक सिध्दात होता था। राज्य अभिषेक के समय राजा को प्रजा पालन कि शपथ लेनी पडती थी। इस समय मंत्री परिषद् के 18 विभाग थे तथा अन्धक, वृष्णि, कुकुर, और भोज प्रमुख गणराज्य थे।
6. महाजनपद काल- इस समय राजतंत्र व गणतंत्र शासन व्यवस्था का विकास हो चुका था। इनकी कल्पना जातिय के स्थान पर भौगोलिक हो गइ्र्र थी। बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर इकाई मे 16 महाजनपद बताए गए जो निम्न प्रकार है।
महाजनपद - राजधानी
अंग- चम्पा
मगध- राजगृह, पाटलिपुत्र, वैशाली
काशी-वराण्
कौसल-श्रावस्ती
वाज्जि-संघ वैशाली
मल्ल-पावा
चेदि-शुक्तिमती
वत्स-कौशाम्बी
कुरू-इन्द्रप्रस्थ
पांचाल -अहिछत्र
मत्स्य-विराट नगर
सूरसेन-मथुरा
अश्मक-पैदन्य
अवन्ति-उज्जयिनी
गान्धार-तक्षशिला
कम्बोज-श्राजपुर
इनके अलावा गणतंत्र राज्य भी थे जो निम्न प्रकार है-
वंश-जनपद
कपिल वस्तु-शाक्य
रामगाम-कोलिए
सुंसुमरगिरी-भग्ग
अलकप्प-बुलि
केसपुत्त-कालाम
कुशीनारा-मल्ल
पावा-मल्ल
पिप्पलिवन-मोरिय
मिथिला-विदेह
वैशाली-लिच्छवी
7. आश्रम व्यवस्था- व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को 4 आश्रमो मे विभाजित किया गया है।
- ब्रह्यचर्य आश्रम- मनुष्य ब्रह्यचर्य आश्रम मे धर्म से परिचित होता है, शिक्षा प्राप्त कर असकी साधना करता है
- गृहस्थाश्रम- गृहस्थाश्रम मे धर्मरत होकर अर्थ और काम को प्राप्त करता है।
- वानप्रस्थ आश्रम- वानप्रस्थ मे वह पूरा समय समाज कार्य के लिए लगाता था।
- संन्यास आश्रम- संन्यास आश्रम मे वह मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना करता है।
8. संस्कार - भारत मे व्यक्तिगत जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए जिन धार्मिक सामाजिक क्रियाओ को अपनाया जाता है उसे संस्कार कहा जाता है। 16 संस्कार निम्नानुसार है-
- गर्भाधान
- पुंसवन
- सीमन्नतोनयन
- जातकर्म
- नामकरण
- निष्क्रमण
- अन्नप्राशन
- चूडाकर्म
- केशान्त
- समावर्तन
- कर्णवेध
- विद्यारम्भ
- उपनयन
- वेदारम्भ
- विवाह
- अन्त्येष्टी
9. ऋण- भारतीय ऋषियो ने तीन ऋणो से मुक्त होने पर मुक्ति सम्भव है-
- देव ऋण
- पितृ ऋण
- ऋषि ऋण
10. यज्ञ - हमारी संस्कृतिया से 5 यज्ञ बताए गये है-
- ब्रह्यम यज्ञ
- देव यज्ञ
- भूत यज्ञ
- पितृ यज्ञ
- नृप यज्ञ

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